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धवजिािक िम हिंददी के
अपनरी भाषा दहंिरी के प्दि मेरे मन में बचपन से हरी गहरा लगाव रहा है। वण्ममाला में अक्षर, मात्ाओं की घुमाविार
घुंदडयाँ और श्िों की लय मेरे मन में सहज हरी बसिरी चलरी गई। ्ुटपन से हरी में अपने कायिे (कमल कायिा, में
कादमल रहिरी.... सरकणडे की कलम को सयाहरी की िवाि में डुबो-डुबो कर अपनरी दप्य िखिरी पर दलखिरी अब िो
ये सब समृदियाँ हैं पर आज भरी मन को दभगोिरी हैं। यहरी आरंदभक संसकार मेरे भरीिर पढ़ने-दलखने का ऐसा शौक भर
गए, दजसने जरीवन को नई दिशा प्िान की।
समय बिला, सािन बिले, पर भाषा के प्दि प्ेम यथावि रहा। यहरी कारण है दक आज भरी क ु ् न क ु ् दलखिे-
गुनिे रहना, दहंिरी से जुड़े काय्मक्रमों में सदक्रय भागरीिाररी दनभाना मेरे जरीवन का अदभन्न दहससा है। दनगम के दहंिरी
पखवाड़े के काय्मक्रमों के अदिररक्त अन्य दवभागों द्ारा आयोदजि दहंिरी आयोजनों में भरी सहभादगिा का अवसर
दमलिा रहा, जहाँ भाषा के प्दि समान भाव रखने वाले अनेक सादथयों से जुड़ने का सौभागय दमला।
दप्ले वष्म दनगम के दहंिरी पखवाड़े के एक काय्मक्रम के उपरांि मन में एक दवचार अंक ुररि हुआ, यदि दनगम से जुड़े
सभरी दशक्षक, अदिकाररी और कम्मचाररी दहंिरी के दलए एक साझा मंच पर एकदत्ि हों, िो भाषा के प्चार-प्सार को एक
नई ऊजा्म और दिशा दमल सकिरी है। इसरी दवचार से 'धवजिारक हम दहंिरी के' नामक समूह की पररकलपना हुई।
इस पररकलपना को आयाम और नाम िेने का एक मज़बूि आिार बना राजभाषा अदिकाररी श्री अदनतय नारायण
दमश् जरी का संरक्षण, दजनकी सहमदि से यह समूह बना और उनके सुझाव पर हरी इस समूह का नामकरण हुआ, यह
समूह के वल औपचाररक आयोजनों िक सरीदमि नहीं रहा, बदलक दहंिरी को संवेिना, संवाि और वयवहार की भाषा
बनाने का एक सशक्त प्यास बन गया। रचनातमक लेखन, कदविा, कहानरी, उपाखयान, संसमरण जैसे कई दवदवि
गदिदवदियों से न के वल दहंिरी के प्दि जागरूकिा बढ़री, बदलक अनेक द्परी हुई सादहदतयक प्दिभाओं को मंच भरी
दमला। यह िेखकर आदतमक संिोष होिा है दक भाषा के प्दि संकोच करने वाले अनेक साथरी अब िरीरे-िरीरे खुलकर
अपनरी अदभवयदक्त करने लगे हैं। समूह में संसमरण आिाररि गदिदवदियों पर खासा जोर दिया गया है, कयोंदक यहरी
दविा है दजसमें अंिर का लेखक बाहर आिा है और समूह के उद्ेशय 'दहंिरी प्चार और प्सार' को पोदषि करिा है।
मेरे दलए 'धवजिारक हम दहंिरी के ' के वल एक समूह नहीं, बदलक उस संसकार की दनरंिरिा है जो बचपन में िखिरी
और सयाहरी से मन में रोपा गया था। यह समूह एक एक भाव है, जो दहंिरी को के वल बोलने-दलखने िक सरीदमि न रख
उसे जरीने का संकलप बना रहा है। आज आवशयकिा है दक हम दहंिरी को दिखावे की नहीं, बदलक आतमरीय संवाि
की भाषा बनाएँ।
दवश्ास है दक जब िक ऐसे 'धवजिारक' अपने-अपने सिर पर दहंिरी के दलए प्दिबद्ध रहेंगे, िब िक हमाररी भाषा
न के वल सुरदक्षि रहेगरी, बदलक दनरंिर समृद्ध भरी होिरी रहेगरी। दहंिरी हमाररी पहचान है, हमाररी संवेिना है, और इसे थामे
रखना हम सभरी का िादयतव भरी।
रवर वकरण
अधयादपका
दिलशाि गाड्मन
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