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भाििदीय ज्ान पिंपिा औि हिंददी साहित्य
का योिदान
भारिरीय ज्ान परंपरा दवश् की प्ाचरीनिम, समृद्ध और जरीवनोपयोगरी परंपराओं में से एक है, दजसकी दनरंिरिा
वैदिक काल से आिुदनक युग िक दिखाई िेिरी है। वेि, उपदनषि, िश्मन, आयुववेि, गदणि, जयोदिष, लोकपरंपराएँ
और संि सादहतय ने भारिरीय समाज के बौदद्धक, नैदिक, आधयादतमक और सांसकृदिक दवकास को गहराई प्िान की
है। इस परंपरा का उद्ेशय के वल ज्ान अज्मन नहीं, बदलक मानव जरीवन का समग्र दवकास, आतमबोि, कि्मवयदनठिा
और सामादजक समरसिा रहा है। 'वसुिैव क ु टुमबकम्', 'दनषकाम कम्म' और 'अदहंसा' जैसे मूलय इसरी दचंिन की
आिारदशला हैं।
दहंिरी सादहतय ने भारिरीय ज्ान परंपरा को जनभाषा में रूपांिररि कर उसे वयापक समाज िक पहुँचाने का काय्म
दकया। भदक्तकाल के संि कदवयों-कबरीर, िुलसरी, सूर और मरीरा ने िाश्मदनक दवचारों को सरल, भावपूण्म और लोक-
संवेिनशरील भाषा में प्सिुि दकया। िुलसरीिास की रामचररिमानस में कि्मवय, मया्मिा, भदक्त और मानविा का अद्ि
ु
समन्वय दिखाई िेिा है।
आिुदनक दहंिरी सादहतय ने भारिरीय िश्मन को सामादजक यथाथ्म और राषट्रीय चेिना से जोड़ा। प्ेमचंि के
उपन्यासों और कहादनयों में सामादजक न्याय, सहानुभूदि और कम्मप्िान जरीवन-दृदटि सपटि रूप से उभरिरी है। दनराला,
पंि और महािेवरी वमा्म ने भारिरीय आधयादतमक चेिना को आिुदनक संवेिनाओं के साथ अदभवयक्त दकया।
दहंिरी सादहतय ज्ान के प्सार का प्भावरी माधयम रहा है। लोककथाएँ, कहाविें, बाल सादहतय और आिुदनक
रचनाएँ नैदिक दशक्षा, चररत् दनमा्मण और सांसकृदिक मूलयों को सुदृढ़ करिरी हैं। दडदजटल युग में ई-पुसिकें , सोशल
मरीदडया और ऑनलाइन मंच दहंिरी सादहतय को नई परीढ़री से जोड़ने के नए अवसर प्िान कर रहे हैं।
अिः भारिरीय ज्ान परंपरा और दहंिरी सादहतय दमलकर अिरीि, वि्ममान और भदवषय के बरीच एक सशक्त सेिु
का दनमा्मण करिे हैं और भारिरीय समाज को नैदिक व सांसकृदिक दिशा प्िान करिे हैं।
धारणा मलहोत्ा
(अधयादपका) दनगम प्ाथदमक दवद्ालय
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