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माटदी का कज्ष                                  िकीक़ि में जदीिदी हँ



                 रो रहरी है आज कयूं ये भू-िरा, वसुंिरा,                 खवाब नहीं, हकीक़ि में जरीिरी हूँ,
             कयूं हो रहा है इसका क्षय मनुज िू सोच िो जरा।               कभरी कहिरी हूँ, कभरी चुप रहिरी हूँ,
                                                                       कभरी हंसिरी हूँ, कभरी जरी भर रोिरी हूँ,
             ििक रहरी है आज वो िू खेला था दजस गोि में,                कभरी दबन कहे सब चुपचाप सहिरी हूँ,
              दफकर नहीं िुझे िदनक िू दफर रहा है मौज में।          िो कभरी जोश से बाअिब अपनरी बाि रखिरी हूँ,


              िानरी-सरी जो चुनर िरा की थरी कभरी हररी-भररी,             खवाब नहीं, मैं हकीक़ि में जरीिरी हूँ।।
               यह अँट गई है िूल से महतवाकांक्षा से िेररी।
                                                                       कभरी खूबसूरि फ ू लों-सरी महकिरी हूँ,
                   वृक्ष ठूंठ हो गए पखेरू सारे सो गए,                  ज़रूरि पड़ने पर कांटों सरी चुभिरी हूँ,
                 दृशय सुनहरे वो सभरी िेख आज खो गए।                        कभरी डर से मैं सहम जािरी हूँ,


                  जंग खा रहरी जमीं मनुषय िेररी भूल से,              िो कभरी बेखौफ़ हर मुदशकल से लड़िरी हूँ,
            कभरी लगाया करिा था दिलक िू दजसकी िूल से।                  कभरी अपने आदशयाने में कै ि रहिरी हूँ,
                                                                   िो कभरी खुलरी दकिाब के  पन्नों सरी खुलिरी हूँ,
                उजड़ गए हैं वन सभरी जो थे कभरी हरे-भरे,                 खवाब नहीं, मैं हकीक़ि में जरीिरी हूँ।।
                  क ं क्रीट के  पहाड़ बन के  राक्षस खड़े।


                िेररी खवादहशों के  दबंिु बाढ़ बन उमड़ रहे,              कभरी मनमानरी दज़ि मैं भरी करिरी हूँ,
                पिन के  काले-काले ये घन घने घुमड़ रहे।                    कभरी मन में सब्र मैं भरी िरिरी हूँ,

                                                                       कभरी निरी की िारा सरी मचलिरी हूँ,
               उजाड़िा हरी जा रहा है वन दवरल शनैः-शनैः,               कभरी आसमां के  दसिारे सरी चमकिरी हूँ,
                   िे रहरी चेिावनरी प्कृदि ये पुनः पुनः।
                                                                        कभरी हवा से बािें भरी मैं करिरी हूँ,
               कहीं िो पड़ रहा अकाल बाढ़ कहीं दघर गई,                   कभरी घनघोर बाररश सरी बरसिरी हूँ,
                 अपने सवाथ्म में मनुषय प्ज्ा िेररी दफर गई।             खवाब नहीं, मैं हकीक़ि में जरीिरी हूँ।।


               काट के  वनों को िू ना अपना यूं दवनाश कर,
              प्कृदि से ना खेल यूं ना सभयिा का नाश कर।                कभरी ज़मरीन से मज़बूि ररशिा रखिरी हूँ,
                                                                     िो कभरी पंख खोल हवाओं में उड़िरी हूँ,
                समय अभरी है हाथ में िू जाग रे िू जाग रे,              कभरी ्ुई मुई सरी नाजुक बन जािरी हूँ,
                सँवार अपनरी प्कृदि कि्मवय से ना भाग रे।              िो कभरी जोश से अपने किम बढ़ािरी हूँ,


               िो कर ले दनचिय िू िरा उजड़ने से बचाएगा,                पर इस जोश में कभरी होश नहीं खोिरी हूँ,
               जन्मा है दजस माटरी से िो कज्म भरी चुकाएगा।             मान-मया्मिा का भरपूर धयान रखिरी हूँ,
                                                                     खवाबों में नहीं, मैं हकीक़ि में जरीिरी हूँ।।
                                                  उरा रानली
                      अधयादपका, दनगम दवद्ालय नवािा गाँव                                                    सलीमा
                                                                                             अधयादपका नजफगढ़
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