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नमन िुमिें िै नािदी परिवाि
िुम शदक्त िुम हरी िश्मन। सवग्म से सुंिर, सपनों से पयारा
हो िुम अनुकरणरीय आिश्म ।। हो जािा पररवार।
जब होिरी आपस में एकिा
िुम संयम िुम हरी दृढ़िा।
दमलिे सबके दवचार ।
हो िुम मोहक सनेदहल सपश्म।। सुंिर संसार होिा, पयारा पररवार होिा...
कोमल हो पर कमजोर नहीं। आपस की खट्री-मरीठरी बािें
घर में हरी रह जािरी।
िुम कठपुिलरी की डोर नहीं।।
ना कोई होिरी कै के यरी
कभरी दनखररी, कभरी िुम दबखररी। ना मंथरा घर में आिरी।
कभरी सजरी िो कभरी हो संवररी।। काना-फ ू सरी, िाक झाँक का दवचार, नहीं होिा।
खुशहालरी दकलकाररी भरिरी
घर में ना कोई रोिा।
िू चले िो चले ये िुदनया साररी। जगमग करिरी चाँि रोशनरी
िू रुके िो रुके ये िुदनया साररी।। आंगन में खुदशयों की बौ्ार।
महकािरी घर आंगन की कयाररी। सुंिर संसार होिा, पयारा पररवार होिा.......
भावों की मूरि हो िुम नाररी।।
बड़े, ्ोटे का मान होिा, ना िेिा कोई गालरी।
घर में ना बढ़िा दववाि, ना कोई बजािा िालरी।
िुम लक्मरी हो िुम हरी िुगा्म आपस में ना वैर रखिे, रहिे पयार से पयारे।
िुम हरी हो झांसरी की रानरी।। सुख-िु:ख दमलके साथ दनभािे
कटिे चैन से जरीवन के दिन सारे।
पर जब जब टूटा बाण सब्र का।
मन में ना कोई लोभ होिा लालच ना पैर पसारे।
िब सब पर भाररी पड़री ये नाररी।। सुंिर संसार होिा, पयारा पररवार होिा...
सववता रमा्ष
अधयादपका, दशक्षा दवभाग नलीरज क ु मार
सहायक आयुक्त
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