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घबिाना कै सा





              जो कल था.. वो आज नहीं..                             नज़र घुमाओ आस-पास

              जो आज है.. वो कल नहीं...                            बहुि लोग अपने हैं

              हर दिन नया, हर क्षण नया                             अपने हैं.. अपनों से कभरी..

              पल-पल नया पल आिा हैं।                               झगड़े भरी हो जािे हैं

              दमनट-दमनट, घड़री-घड़री                                िागे उलझ जािे हैं ऐसे
              शनै शनै वक़ि गुज़र जािा हैं।                        दक उनके  दसरे भरी खो जािे हैं।

              िो कयूँ मोह लगाए इस पल से                           दसरे ढूँढकर उनको सुलझाना,

              बस जरी ले िू इसे जरी भर के  कयोंदक..                दबगड़री बाि बन सकिरी है..

              ये पल न दफर कल आएगा पर डर मि..                      ये एक बार िो आज़माना

              कल भरी िो नया पल लाएगा ।                            पर दसरों को खींच ना िेना..

              कल बचपन था, आज यौवन है,                             गांठें पककी हो जािरी हैं।

              कल प्ौढ़ अवसथा आएगरी ।                              िरीरज िरकर हरी के वल,

              कल कोमल था, आज खूबसूरि है,                          उलझन सुलझ पािरी है ।

              पर कल की शाम िो अनुभव लाएगरी।                       उलझन के  उस िौर में दिल को समझाना ऐसा..
              अनुभव भररी शाम में दिल को बिलाना ऐसा                दक सब्र की लाठरी थामने से घबराना कै सा ।।

              दक दिन और उम्र के  ढल जाने से घबराना कै सा ।।

                                                                                                           रलीता

              ्ोटरी-सरी दज़ंिगरी में                                                   दवरासि अनुसंिान सहायक

              दकिने सारे सपने हैं








                                 1. वनज भारा उन्नवत अहै, सब उन्नवत को मू् ।

                                2. सर् है सुबोध है, वहन्िली हली हमारा बोध है ।








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