Page 33 - MCD
P. 33
समाज में मेिा योिदान िाम सिुहि
‘राम का नाम एक दिवय प्काश है,
समाज में मैं, एक सिंभ-सरी हूँ, राम का नाम सकल जग ्ाया।
उसकी घटनाओं का जैसे मैं, प्दिदबंब-सरी हूँ। राम अनादि हैं राम अनन्ि हैं,
मेरा हर किम उठे, उतथान के दलए, राम हरी जाने राम की माया ।।
हर कम्म मेरा हो, सममान के दलए। मंदिर मंदिर ढ़़ूढ़ने वाला
हर दकसरी के काम आना संकलप हो मेरा, राम को पाया न िाम को पाया
साथ्मक हो जरीवन, चाहे अलप हो मेरा। राम के नाम को दचर् मे िर लो
राम मयरी हो जाएगरी काया।।
साक्षरिा, सवच्िा व मदहला सशदक्तकरण,
हर घड़री यहरी हो मेरा प्बल प्ण। “राम नाम से ररीदि गया”
समाज में मेरा मान है द्पा, नाम से ररीदि काया, काया है बस नाम की।
चुकाऊ ं वो सब, जो समाज से दलया। दजस काया ना राम दवराज, वो काया दकस काम की ।।
समाज की मेरे, आवाज़ मैं बनूं, िुमने लफड़े दजिने पाले, कर िो उनको राम हवाले।
दमलकर समाज में एक साज-सरी रहूँ। ओढ़ चुनररया राम नाम की, माला जप श्रीराम की”
समाज के प्दि प्ेम मुझमें हो, दजस काया ना राम दबराजे वो काया दकस काम की।।
जलिरी रहे मुझमें दनि समप्मण की लौ। राम नाम .................................।।
हर क्षण समाज में मेरा योगिान हो,
दनि दकए मेरे प्यासों से नव दनमा्मण हो। पतथर की ये महल अटाररी, िुमहें बना डालेंगरी दभखाररी।
समाज के दलए खुि को ढाल लूँगरी मैं, राजा बन जा झोलरी में भर, िौलि राम के नाम की ।।
संवेिना का सागर भरी संभाल लूँगरी मैं। दजस काया ना ............................।।
िम्म हो मेरा सहरी समाज का चयन, राम नाम से ................................।।
संकलप हो मेरा सवसथ समाज का गठन। रामचरण में नेह लगा ले, अपने िरीनों लोक बना ले,
इस संकलप के साथ, बढ़िरी रहूँगरी मैं, सािु मनवा दचन्िा कर ले, सतय सनािन िाम की।।
समाज के हर कम्म में साथ िूँगरी मैं दजस काया ना राम ..........................।।
हर किम पर मेररी पहचान यहरी हो। राम नाम से ररीदि काया....................।।
साथ्मक दनि नया अदभयान कोई हो ।
अक्षर क ु मार रािव
सलीमा रमा्ष अधयापक दशक्षा दवभाग
अधयादपका
fuxe vkyksd ¼o"kZ&2025½ 33

