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हिंददी का िुणिान
दहंिरी से हरी दहंि का उदजयारा दनज भाषा का उपहास करें कयूँ
दहंिरी आलोक फैला रहरी है। माँ भारिरी ये पुकार रहरी है।
दहंिरी ज्ान का िरीपक बनकर
संसकृि से दनकलरी अदवरल िारा अँदियारे को भगाए रहरी हैं।
प्ाकृि अपभ्ंश को समाए रहरी है।
कबरीर, िुलसरी सूर के पिों से दहंिरी को जरीवन में अपनाकर
भर-भर गागर लाए रहरी है। उजजवल भदवषय बनाए रहरी हैं।
दशक्षा से दशखर िक है पहुँचरी
अविरी, ब्रज के प्ाचरीन सवर में दहंि की नस नस में समाए रहरी है।
दहंिरी िराना सुनाए रहरी है।
भदक्त काल की रस की सररिा दहंिरी श्ास है, दहंिरी प्ाण है
झर-झर भदक्त बहाए रहरी है। दहंिरी दहंि का मान सममान है।
दहंिरी में बहे ममिा की िारा
कृषण के प्ेम की िरीवानरी बनकर माँ की लोररी सुनाए रहरी है।
मरीरा भाव सुनाए रहरी है।
भारिेंिु के नवजागरण से ये आओ दमलकर शपथ उठाए
जग को दिशा दिखाए रहरी है। दहंिरी का हम मान बढ़ाए।
दवश् पटल पर इसका परचम
जयशंकर के वरीर रस की िारा हम सब दमलकर लहराए फहराए ।
महािेवरी की करुणा पुकार रहरी है। दहंि से दहंिरी, दहंिरी से हम
दिनकर, दनराला के नवगरीिों से भारि मािा का मान बढ़ाए।
ओज जन-जन में पसार रहरी है। अनलीता क ु मारली
प्ाथदमक अधयादपका
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